Thursday, August 14, 2014

यादों का पिटारा

क़लम को बोल, जुबां को शब्द देती तुम,
आ निकली हो कहीं इस गहरी रात में,
साथ लिए कुछ खट्टी-मीठी यादों का पिटारा..
तपती गर्मी में पेड के नीचे घंटो बातें करना,
गुलमोहर के झरते पत्ते, और, तुम्हारा शरमा कर कहना-
“पत्ते भी तुम्हारी ही तरह शैतान हैं!!!”....
बाईक की पिछली सीट पर किसी को न बैठने देना,
हाँ, सच ही तो है, अब हर चीज़ पर सिर्फ तुम्हारा ही हक था...
साथ तुम्हारे हो, तो मन में चलता द्वन्द,
दुनिया की नज़रों से तुम्हे बचाने की कोशिश में,
अपनी नज़रों में तुम्हे छिपाना, और,
तुम्हारा हलके से मुस्कुराना – “ऐसे क्या देख रहे हो!!”...
एक दूजे का हाथ थाम,
निकलना सूनी सड़क पर, चाह,
सड़क का आखिरी कोना हमारे साथ साथ चले बढ़ता,
जहां सिर्फ हम और तुम हो, पर,
ये हो ना सका, और अब,
यादों के इस पिटारे को खोल, बह निकली हो तुम सर्द हवा सी,
आ निकलो फिर से इस गहरी रात में,

क़लम को बोल, जुबां को शब्द देती तुम....

क्यूंकि एक दोस्त ज़रूरी होता है....

सुनते हैं, एक दोस्त ज़रूरी होता है,
हाँ...थे तुम, और ‘तुम’, और रहोगे “तुम”....
कॉलेज का वो पहला दिन, जब मिले थे तुम
दोनों हम डरे सहमे से,
जैसे निकले हो सूने जंगल से जाती किसी सड़क पर,
तिमिर के उस मायाजाल में,
जब हाथ को हाथ नहीं दिखता था,
तुम्हारे साथ होने का एहसास,
तुम्हे साथ लेकर चलने की आस,
मन के भविष्य के सपने संजोये,
बीज हमने भी भावनाओं के बोये,
लेकिन क्या पता था!!!..
जीवन की वास्तविकता में जब वही भावनाएं छलने लगीं,
जब तुम्हे मेरी झूठी नाराज़गी और सच्ची दोस्ती खलने लगी,
यह कहकर कि “मुझे और भी बहुत काम है”,
कहाँ अब एक पल को भी विश्राम है,
चल दिए अपना ‘अवरोधक’ छोड़कर,
अपनी प्रगति के पथ पर,
और मैं खड़ा रहा ये सोचता,
कि एक दोस्त ज़रूरी होता है...
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 फिर मिले ‘तुम’,
तब तक मैं शायद ‘बड़ा’ हो चुका था,
जीवन के दिए घाव, आंसुओं से धो चुका था,
यह नया जीवन, नया संसार है,
भ्रम से इतर, सभी कुछ बेकार है,
पहली नौकरी के दिन बड़े सुहाने थे,
तुमसे ही जीवन के सभी फ़साने थे,
तुमने भी ना मुझे निराश किया,
मेरी कमियों, मेरी बातों को तराश दिया,
पर फिर भी एक कमी रही,
‘सच’ जो न कहनी थी, मैंने कही,
और फिर जैसा कि दुनिया का दस्तूर है,
सत्य से मिठास कोसों दूर है,
न सह पाए ‘तुम’ ‘कड़वी’ बात,
पर सत्य जानो, लगा दोनों ही के मन को आघात,
मैं तो मन को मान भी लेता,
तुमको फिर अपना जान ही लेता,
पर ‘तुम’ जब यह सोच चुके थे,
मुझसे रिश्ता तोड़ चुके थे,
खड़ा रहा मैं ‘उसी’ सड़क पर,
तुम्हे जाते देखता और ये सोचता,
कि एक दोस्त ज़रूरी होता है...
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अब मिले हो “तुम”...
फिर से यह एक नया परिवेश है, किन्तु मेरे भाग्य का ‘समर अभी शेष है’,
 “तुम” में फिर से वही तुम और ‘तुम’ दिखा है,
हाँ, पिछली बातों से कुछ तो मैंने सीखा है,
कर रहा हूँ प्रयास, रह जाऊं चुप, न खोलूँ अपने मन की बात
निगलूँ सच, बोलूँ प्रिय, न पहुंचे तुम्हे आघात,
पर, क्या करूँ, फिर भी, अवहेलना मैं सह नहीं पाता हूँ,
यदा-कदा सच बोल, तुम्हे वाणी-हानि पहुंचाता हूँ,
पर, मन का यह दुःख बतलाऊँ किसे,
इस सागर के पार ले जाऊं किसे,
कहीं “तुम” भी, तुम जैसे निकलो,
मेरी पीड़ा को व्यंग्य के साथ उगलो,
या फिर, “तुम” भी करो वही प्रहार,
जो ‘तुम’ ने किया था पिछली बार,
सच है, “तुम” को खोने से डरता हूँ,
लेकिन बस इतनी आशा करता हूँ,
सोचा है मैंने ही हर बार,
सोच कर देखो “तुम” भी इस बार,

 कि एक दोस्त ज़रूरी होता है.....