सुनते
हैं, एक दोस्त ज़रूरी होता है,
हाँ...थे
तुम, और ‘तुम’, और रहोगे “तुम”....
कॉलेज
का वो पहला दिन, जब मिले थे तुम
दोनों
हम डरे सहमे से,
जैसे
निकले हो सूने जंगल से जाती किसी सड़क पर,
तिमिर
के उस मायाजाल में,
जब
हाथ को हाथ नहीं दिखता था,
तुम्हारे
साथ होने का एहसास,
तुम्हे
साथ लेकर चलने की आस,
मन
के भविष्य के सपने संजोये,
बीज
हमने भी भावनाओं के बोये,
लेकिन
क्या पता था!!!..
जीवन
की वास्तविकता में जब वही भावनाएं छलने लगीं,
जब
तुम्हे मेरी झूठी नाराज़गी और सच्ची दोस्ती खलने लगी,
यह
कहकर कि “मुझे और भी बहुत काम है”,
कहाँ
अब एक पल को भी विश्राम है,
चल
दिए अपना ‘अवरोधक’ छोड़कर,
अपनी
प्रगति के पथ पर,
और
मैं खड़ा रहा ये सोचता,
कि
एक दोस्त ज़रूरी होता है...
................................................
फिर
मिले ‘तुम’,
तब
तक मैं शायद ‘बड़ा’ हो चुका था,
जीवन
के दिए घाव, आंसुओं से धो चुका था,
यह
नया जीवन, नया संसार है,
भ्रम
से इतर, सभी कुछ बेकार है,
पहली
नौकरी के दिन बड़े सुहाने थे,
तुमसे
ही जीवन के सभी फ़साने थे,
तुमने
भी ना मुझे निराश किया,
मेरी
कमियों, मेरी बातों को तराश दिया,
पर
फिर भी एक कमी रही,
‘सच’
जो न कहनी थी, मैंने कही,
और
फिर जैसा कि दुनिया का दस्तूर है,
सत्य
से मिठास कोसों दूर है,
न
सह पाए ‘तुम’ ‘कड़वी’ बात,
पर
सत्य जानो, लगा दोनों ही के मन को आघात,
मैं
तो मन को मान भी लेता,
तुमको
फिर अपना जान ही लेता,
पर
‘तुम’ जब यह सोच चुके थे,
मुझसे
रिश्ता तोड़ चुके थे,
खड़ा
रहा मैं ‘उसी’ सड़क पर,
तुम्हे
जाते देखता और ये सोचता,
कि
एक दोस्त ज़रूरी होता है...
...........................................
अब
मिले हो “तुम”...
फिर
से यह एक नया परिवेश है, किन्तु मेरे भाग्य का ‘समर अभी शेष है’,
“तुम” में फिर से वही तुम और ‘तुम’ दिखा है,
हाँ,
पिछली बातों से कुछ तो मैंने सीखा है,
कर
रहा हूँ प्रयास, रह जाऊं चुप, न खोलूँ अपने मन की बात
निगलूँ
सच, बोलूँ प्रिय, न पहुंचे तुम्हे आघात,
पर,
क्या करूँ, फिर भी, अवहेलना मैं सह नहीं पाता हूँ,
यदा-कदा सच बोल, तुम्हे वाणी-हानि पहुंचाता हूँ,
पर,
मन का यह दुःख बतलाऊँ किसे,
इस
सागर के पार ले जाऊं किसे,
कहीं
“तुम” भी, तुम जैसे निकलो,
मेरी
पीड़ा को व्यंग्य के साथ उगलो,
या
फिर, “तुम” भी करो वही प्रहार,
जो
‘तुम’ ने किया था पिछली बार,
सच
है, “तुम” को खोने से डरता हूँ,
लेकिन
बस इतनी आशा करता हूँ,
सोचा
है मैंने ही हर बार,
सोच
कर देखो “तुम” भी इस बार,
कि एक दोस्त ज़रूरी होता है.....
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