क़लम
को बोल, जुबां को शब्द देती तुम,
आ
निकली हो कहीं इस गहरी रात में,
साथ
लिए कुछ खट्टी-मीठी यादों का पिटारा..
तपती
गर्मी में पेड के नीचे घंटो बातें करना,
गुलमोहर
के झरते पत्ते, और, तुम्हारा शरमा कर कहना-
“पत्ते
भी तुम्हारी ही तरह शैतान हैं!!!”....
बाईक
की पिछली सीट पर किसी को न बैठने देना,
हाँ,
सच ही तो है, अब हर चीज़ पर सिर्फ तुम्हारा ही हक था...
साथ
तुम्हारे हो, तो मन में चलता द्वन्द,
दुनिया
की नज़रों से तुम्हे बचाने की कोशिश में,
अपनी
नज़रों में तुम्हे छिपाना, और,
तुम्हारा
हलके से मुस्कुराना – “ऐसे क्या देख रहे हो!!”...
एक
दूजे का हाथ थाम,
निकलना
सूनी सड़क पर, चाह,
सड़क
का आखिरी कोना हमारे साथ साथ चले बढ़ता,
जहां
सिर्फ हम और तुम हो, पर,
ये
हो ना सका, और अब,
यादों
के इस पिटारे को खोल, बह निकली हो तुम सर्द हवा सी,
आ
निकलो फिर से इस गहरी रात में,
क़लम
को बोल, जुबां को शब्द देती तुम....
No comments:
Post a Comment